नमाज़े जुमा में शरीक तीन किस्म के लोग
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर र. अ. से रिवायत है की रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया :
"नमाज़े जुमा में तीन तरह के लोग आते है :
1 वो शख्स जो जुमा के लिए आये और ख़ुत्बा सुनने के बजाय किसी लुग्व काम में मशगूल हो जाये ,
ऐसे शख्स को सिवाय उख़रवी नुकसान और गुनाह के कुछ हासिल नहीं होगा।
2 वो शख्स जो जुमा के लिए आये और ख़ुत्बा सुनने के बजाय दुआ मांगने में मशगूल हो जाये,
ऐसे शख्स का मामला अल्लाह के सुपुर्द है चाहे उसकी दुआ को क़ुबूल फरमाये या रद्द फरमाये।
3 वो शख्स जो इत्मीनान व ख़ामोशी के साथ नमाज़े जुमा में आकर शरीक हो (और ख़ुत्बा सुनने
में मशगूल हो जाये ) न किसी मुसलमान की गर्दन फलांगे और न किसी को तकलीफ पहुंचाए।
(ऐसे शख्स के लिए ये जुमा और मज़ीद तीन दिन (यानि कुल 10 दिनों तक) गुनाहो की बख़्शिश
( या दर्जात की बुलंदी) का सबब बन जाता है। "
(मुस्नद अबु दाऊद:1115)
हक़ बात - सबके साथ
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर र. अ. से रिवायत है की रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया :
"नमाज़े जुमा में तीन तरह के लोग आते है :
1 वो शख्स जो जुमा के लिए आये और ख़ुत्बा सुनने के बजाय किसी लुग्व काम में मशगूल हो जाये ,
ऐसे शख्स को सिवाय उख़रवी नुकसान और गुनाह के कुछ हासिल नहीं होगा।
2 वो शख्स जो जुमा के लिए आये और ख़ुत्बा सुनने के बजाय दुआ मांगने में मशगूल हो जाये,
ऐसे शख्स का मामला अल्लाह के सुपुर्द है चाहे उसकी दुआ को क़ुबूल फरमाये या रद्द फरमाये।
3 वो शख्स जो इत्मीनान व ख़ामोशी के साथ नमाज़े जुमा में आकर शरीक हो (और ख़ुत्बा सुनने
में मशगूल हो जाये ) न किसी मुसलमान की गर्दन फलांगे और न किसी को तकलीफ पहुंचाए।
(ऐसे शख्स के लिए ये जुमा और मज़ीद तीन दिन (यानि कुल 10 दिनों तक) गुनाहो की बख़्शिश
( या दर्जात की बुलंदी) का सबब बन जाता है। "
(मुस्नद अबु दाऊद:1115)
हक़ बात - सबके साथ
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