#माँ_का_मर्तबा
एक आदमी अपनी माँ को अपनी पीठ पर लादकर तवाफ़ करा रहा था।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मुलाकात हुई उसने
ज़रा एक शेर पढ़ा
उसके बाद ये कहा , ऐ अब्दुल्लाह बिन उमर र. अ. !
क्या मैंने अपनी माँ का हक़ अदा कर दिया ?
क्योंकि मैं बूढी माँ को काँधे पर लाधकार तवाफ़ करा रहा हूँ।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा ,
'सुन ले जिस वक़्त तू दुनिया में आया था उस वक़्त माँ को जितनी
तकलीफ हुई थी उस तकलीफ के एक साँस के बराबर भी तूने माँ का
हक़ अदा नहीं किया।
(अल-अदबुल , हदीस-6, बाब 5 बुखारी )
एक आदमी अपनी माँ को अपनी पीठ पर लादकर तवाफ़ करा रहा था।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मुलाकात हुई उसने
ज़रा एक शेर पढ़ा
उसके बाद ये कहा , ऐ अब्दुल्लाह बिन उमर र. अ. !
क्या मैंने अपनी माँ का हक़ अदा कर दिया ?
क्योंकि मैं बूढी माँ को काँधे पर लाधकार तवाफ़ करा रहा हूँ।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा ,
'सुन ले जिस वक़्त तू दुनिया में आया था उस वक़्त माँ को जितनी
तकलीफ हुई थी उस तकलीफ के एक साँस के बराबर भी तूने माँ का
हक़ अदा नहीं किया।
(अल-अदबुल , हदीस-6, बाब 5 बुखारी )
No comments:
Post a Comment